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Showing posts with the label उपनिषद

जे कृष्णामूर्ती यांचा व्यावहारिक सल्ला j krusnamurti preaches

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जिद्दू यांनी खूप व्यावहारिक आणि छान मार्ग सांगितला. उपनिषदां मध्ये देखील असाच छान आणि व्यावहारिक मार्ग दिला आहे.  आपल्याला वाटतं हिंदुत्वज्ञान अध्यात्मिकता हे सगळे एकांगी आहे; पण तसे नाहीये. म्हणून हे वाचा. आधुनिक संत जे. कृष्णमूर्तीजी हे अधिक व्यावहारिक ऋषी होते. ते म्हणतात की अन्न, पैसा आणि सेक्सची गरज या नैसर्गिक इच्छा समस्या नाहीत. त्या जीवनाचा भाग आहेत; परंतु या गोष्टींची अतिरेक किंवा लोभ किंवा वासना ही समस्या आहे. ती तुमच्यासाठी आणि समाजासाठी दुःख निर्माण करते. या अतिरेकी लोभामुळे आजचा समाज अशांत आहे. म्हणून आपण योगाचा मार्ग अवलंबूया आणि सर्वांना आनंद देण्याच्या अंतिम ध्येयासाठी स्वतःला आणि आपल्या समाजाला शुद्ध करूया. जय गुरुदेव. A modern saint J krushnamurti ji was more practical sage. He says natural urges viz. need of food, money and sex are not a problem. They are part of life; but too much want or greed or lust of these things is the problem. It creates unhappiness to you and also the society. Today's society is on unrest due to these excessive greed. So let us follow th...

मानव-समाज व विश्व बंधुता

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🚩 ' सर्वं खलु इदं ब्रह्म. ' अर्थात : हे सर्व काही परब्रम्ह आहे. ' हे विश्वचि माझे घर ऐसी जयाची मती स्थिर  किंबहुना चराचर आपणची झाला. ' हे एकदा समजले की मग ' मानवतेची महागाथा ' उमजायला वेळ लागत नाही व ' मानवता ' विषयावर ' ततो न विजीगुप्सते ' अर्थात : या विषयाची घृणा देखील वाटत नाही.  प्रश्न राहिला तो असा की जे आक्रमण करतात त्यांच्या बद्दल काय करायचे ? स्वतःला व हिंदु धर्माला कसे टिकवायचे ?  तर त्यावर असे आहे की,  ' विनाशय च दुष्कृतां ' अर्थात : दुष्टांचे निर्दालन करावे. 🕉️ 🙏

उपनिषद ज्ञान भाग ~१८ ईशावास्य उपनिषद का समापन व सार.

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● उपनिषद ज्ञान भाग ~ १८  ईशावास्य उपनिषद श्लोक ~ १८  ( अंतिम श्लोक ) अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्‌ ।  युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥१८॥  ○ हे अग्ने, हे देव; तुम सब प्रकार के कर्मो को जानते हो । तुम हमे उन्नति के लिये ऐसे मार्ग से ले चलो जो सुपथ हो । जो कुटिल पाप-मार्ग है उसे हमसे अन्तरात्मा का युद्ध कराकर पृथक्‌ / अलग करो ।  हम बार-बार तुझे नमस्कार करते हैं । अपने अंतिम सांस गिनने वाले मुनिवर जो बातें करते हैं; उसका इस श्लोक में समापन हो जाता है । अब थोड़े ही देर में जब प्राण चले जाएंगे तो अग्नि से शरीर का भस्म होने वाला है । इसलिए वह अग्नि से ही प्रार्थना करते हैं कि; हे अग्नि देवता - आप मेरे अंदर ऐसा बदलाव कराओ के पाप का कोई विचार ना रहे । यह बात बाकी जीवन के लिए भी लागू है; की अग्नि से प्रार्थना हो के; जला दो मेरे कुकर्मों को, जला दे बुरे विचारों को ... और मुझे ले चलो अच्छे कर्मों के पथ पर । हे अग्नि देव मुझे सद् कर्म के लिए अच्छे विचार और वैसी कृति दे दे और मुझे पाप मार्ग से दूर हटा दे । यह है हमारी प्रा...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १७ क्या छोड़कर जाना है मरने के बाद ?

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● उपनिषद ग्यान भाग~ १७   इशावास्य उपनिषद श्लोक ~ १७ : वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तम् शरीरम्‌ ।  ॐ ऋतो स्मर कृत स्मर ऋतो स्मर कृत स्मर ।॥ १७ ॥  ○ जो प्राण-वायु शरीर में रहता है वह मृत्यु के समय विश्व के अनिल अर्थात्‌ विश्व के प्राण में लीन हो जाता है । यह शरीर नही वह प्राण - वह आत्मा ही अमर है । शरीर तो जबतक भस्म नहीं हो जाता तभी तक है ।  हे कर्म करने वाले जीव;  तुमने आगे जो कर्म करना है उसे स्मरण कर, और कृतः -- जो तू अबतक कर्म कर चुके हो, उसे स्मरण कर ॥१७।। जो पिंड में है; वही ब्रम्हांड में है  means whatever principle is in our body the same is in the world / universe - यह हमारा तत्वज्ञान कहता है । उसके अनुसार जो शरीर में वायू है प्राण है वह महद् आकाश मे या विशाल महाभूतो मे होने वाले अनिल है उसमे विलीन हो जायेगा । शरीर तो बस तब तक है जब तक उसमें प्राण है; बाद में तो उसे भस्म ही हो जाना है । वे देखते हैं कि यह पार्थिव शरीर अग्नी को समर्पित किया जायेगा । मुनिवार देख सकते है की; मेरे प्राण शरीर को छोडके जा रहे है; शरीर को अग्नी के हवाले किया जा रहा है । द...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १६

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● उपनिषद ज्ञान भाग ~१६ ईशोपनिषद श्लोक ~१६ पूषन्नेकर्षे यम प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्सम्‌ह ।  तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ।१६॥ ○ सूर्य देव के गुणके अनुसार नाम गिना रहे हैं - हे पूषन्‌-- पुष्टि देनेवाले,  एकर्ष --ऋषियों मे एक अनोखे,  यम - नियमन करनेवाले, सूर्य -- प्रचण्ड प्रकाशमान, प्राजापत्य --प्रजाओं के पति - हे सूर्यदेव; आपकी रश्मियों का व्यूह चारों तरफ फैल रहा है । उन्हीं रश्मियों के कारण प्रकृति के नाना रूप प्रकाशमान हो रहै है । मैं यह प्रकाश आपका न समझकर प्रकृति का समझ रहा हूं । और इसीलिए प्रकृति को ही सब-कुछ समझ बैठा हूं  । आप अपनी रश्मियों को समेटिये ताकि मै आपके कल्याणतम तेजोमय रूप के दर्शन कर सकूं । अहा ! आप के, तेज के, प्रकाश के किरण एक जगह  सिमिट जाने से जो आपका कल्याणतम तेजस्वी पुरुष-रूप प्रकट हुआ, वह कितना ज्योतिर्मय है ! मै भी वही हुं-- मै भी ज्योतिमंय पुरुष परमात्मा हूं ।१६॥ तो हमने देखा कि वे साधु पुरुष मृत्यु के शय्या पर हैं और कुछ सोच रहे है । उन्हे जाने से पहले कुछ खाने की इच्छा नहीं हो रही है, कुछ पीने की...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १५ Fear of death ?

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● उपनिषद ज्ञान भाग १५ इसोपनिषद श्लोक १५  हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌ ।  तत्त्वं पूषन् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । १५॥  ○ हिरण्मय चमक-दमकवाले ढकने से सत्य का मुख ढका हुआ है ।  हे पूषन्‌ ! --अयनो पुष्टि अर्थात्‌ पोषण कर्ता सूर्यदेव; मैं सत्य- धर्म को देखना चाहता हूं इसलिए उस हीरण्मय पात्र का, या ढक्कन का आवरण  हटा दे, पर्दे को उठा दे ॥१५॥ ■ यहां पर हम चिन्मय स्वामी के हिसाब से अर्थ बताएंगे । स्वामी जी कहते हैं कि; इस 15 वे श्लोक में एक ऋषीवर / एक मुनिवर अपने आप मृत्यु के द्वार पर खड़ा पातें है और फिर कुछ चीजों का सोच विचार करते है और इसी कारण से सूर्य देव से कुछ मांगते भी है । वह कहते हैं;  हे सूर्य देव अब मेरी अंतिम घड़ी आ गई है । और मैं सत्य धर्म को देखना चाहता हूं । जब तू अपने इस प्रकाश को फैला कर रखेगा तो मुझे यह भौतिक सृष्टि ही दिखाई देगी । फिर मैं उस सच को  उस परम् ब्रह्म को देख नहीं पाऊंगा । तुम्हारी सुनहरे रंग की आभा मेरे लिए एक पर्दा हो जाएगा । प्रकाश होकर भी पर्दा हो जाएगा । इसलिए हे रवीदेव आप के यह जो सहस्त्र रश्मि / कीरण है उ...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १४ Upanishadas for you.

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उपनिषद ज्ञान भाग ~ १४ इशोपनिषद श्लोक १४ - सभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह ।  विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४  जो संभूति ", अर्थात ‌ “समष्टि-वाद' तथा असंभूति, अर्थात ' व्यक्तिवाद' इन दोनों को एक साथ जानते हैं वे सफल होते हैं । वे असंभूति (अपना भला देखने की दृष्टि) अर्थात्‌ व्यक्तिवाद से मृत्यु के प्रवाह को तो  तैर लेते है और अमृत को संभूति (सबका भला देखने की दृष्टि) अर्थात्‌ समष्टिवाद से चखते हैं ।  [ असंभूति अथवा व्यक्तिवाद (individualism) विनाश-मूलक है इसलिये असंभूति का ही दूसरा नाम  “विनाश" है ]।। १४॥  नरहरि सुनार की एक कथा अब सुनिए । कथानक से  कैसे भेद को दूर करते थे देखीये - अलग-अलग भेदभाव के ऊपर तोड बताई है । उपनिषद के गत 6 श्लोक में आपने देखा है के समन्वय महत्वपूर्ण है।  इसलिए यह है उस वक्त के शैव और वैष्णव के भेद के बारे में सुनिए । एक पंथ के लोग भगवान को केवल एक एक रूप में ही जानते थे । उस वक्त इस कारण से शैव और वैष्णव पंथ में बड़े झगड़े होते थे ।  नरहरि सुनार जी शिव जी को ही मानते थे ।  सुनार होने के कारण उ...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १३ upanishad wisdom for us.

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उपनिषद ज्ञान भाग ~ १३. इशोपनिषद श्लोक १२ और १३ - अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते ।  ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्याः रताः ।१२॥  अन्यदेवाहुः संभवादन्यदाहुरसंभवात्‌ ।  इति शुश्रुम धीराणां  ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३।  जो असंभूति' (अ+-सं + भूति), अर्थात्‌ व्यक्तिवाद individualism की उपासना करते हैं वे गहन अन्धकार मे प्रवेश करते है ।  और जो संभूति" (सं + भूति) अर्थात्‌ समष्टिवाद pluralism   उससे भी गहन अन्धकार में प्रवेश करते हें ।१२॥  संभव" ( सं + भव ) अर्थात्‌ " ' समष्टिवाद' का कुछ और फल है ।  असंभव' ( अ + सं + भव ) अर्थात्‌ समिष्टरूप में न रहकर व्यक्ति को समाज मे मुख्य मानकर ' व्यक्तिवाद'  से चलने का कुछ ओर फल है ।  धीर लोगों ने इन दोनों की जो व्याख्या की है उससे ऐसा ही सुनते आये हैं ॥१३॥  इन २ श्लोक का यह था आचार्य सत्यव्रत जी ने किया हुआ सीधा भाषांतर ।  आज के विश्व में जो दो बड़े पॅटर्न चलते आए हैं - गत 100 साल में; वह आध्यात्मिक नहीं - आर्थिक विषय में और सामाजिक विषय में व्यवस्थापन करने वाले दो वाद हैं । बहुत प्...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १२ Upanishada endorse Science and Spiritualism.

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उपनिषद ज्ञान भाग ~ १२ इशावास्य उपनिषद श्लोक १० और ११ - अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।   इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ।।१०॥  विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।   अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।। ११।।  शब्दार्थ : विद्या से अन्य ही कुछ, ओर अविद्या से अन्य ही कुछ फल होता है । धीर लोगों ने विद्या और अविद्याको जो व्याख्या की है  उससे ऐसा ही सुनते आये हैं ॥१०॥   विद्या तथा अविद्या --इन दोनों को जो एक साथ जानते हैं  वे अविद्या अर्थात्‌ भौतिक-विज्ञान ( science )  से मुत्यु लाने वाले प्रवाहो को तर जाते है और विद्या अर्थात्‌ अध्यात्म-ज्ञान से अमृतः को चखते है ।११।।  भावार्थ : हमने पिछले श्लोक में देखा था के केवल भौतिक या केवल आध्यात्मिक इसमें से एक को पकड़ के रहोगे तो एकांगी हो जाओगे... तो नष्ट हो जाओगे । यह बात क्यों कैसे सच है यह १० और ११ वें श्लोक में मुनीवर बता रहे हैं । कहते हैं कि जो science है मतलब फिजिकल scienses हैं उनका कोई एक फल / benefit होता है । और जो स्पिरिचुअल थॉट्स है उनका एक अलग स...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ ११ Upanishada wisdom for our use.

卐 उपनिषद ज्ञान भाग ~ ११   अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।  ततो भूय इव ते तसो य उ विद्यायां रताः ॥९॥  शब्दार्थ : जो " अविद्या "अर्थात्‌ भौतिकवाद " ( materialism ) की उपासना करते है वे गहन अन्धकार मे जा पहुंचते हैं, ओर जो “विद्या " अर्थात्‌  अध्यात्मवाद  " ( spiritualism ) मे रत रहने लगते है; और भौतिक-जगत्‌ की परवाह ही नहीं करते वे उससे भी गहरे अन्धकार मे पहुचते हैं   ॥९॥  balance the both! कई लोगों को यह लगता है कि हमारी जो सांस्कृतिक धरोहर है वह केवल भौतिक जीवन का त्याग सिखाने वाली ही है । वैसा था तो नहीं   लेकिन लोगों को वैसा होने का एहसास होता रहा इसका कारण है की बीच वाले समय में भक्ति मार्ग आदि का आग्रह करते हुए कामना वासना और भौतिक जीवन की बाकी सभी इच्छाओ को  बहुत कम आंका गया ।  यह बात लोगों के जीवन में आइ ऐसे तो नहीं; लेकिन सर्व सामान्य लोगों की या सामाजिक भावना ऐसे रही कि केवल भक्ति में रत रहो । केवल सदा सर्वदा देव देव करो । यह हो गया था ।   उसके पहले का एक समय था जब कामशास्त्र के अनुयाई और अध्यात्म ज्ञान ...