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मानव-समाज व विश्व बंधुता

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🚩 ' सर्वं खलु इदं ब्रह्म. ' अर्थात : हे सर्व काही परब्रम्ह आहे. ' हे विश्वचि माझे घर ऐसी जयाची मती स्थिर  किंबहुना चराचर आपणची झाला. ' हे एकदा समजले की मग ' मानवतेची महागाथा ' उमजायला वेळ लागत नाही व ' मानवता ' विषयावर ' ततो न विजीगुप्सते ' अर्थात : या विषयाची घृणा देखील वाटत नाही.  प्रश्न राहिला तो असा की जे आक्रमण करतात त्यांच्या बद्दल काय करायचे ? स्वतःला व हिंदु धर्माला कसे टिकवायचे ?  तर त्यावर असे आहे की,  ' विनाशय च दुष्कृतां ' अर्थात : दुष्टांचे निर्दालन करावे. 🕉️ 🙏

उपनिषद ज्ञान भाग ~ ८ ॐ Upanishad wisdom ।

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उपनिषद भाग ८ ~ सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।  सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते । ॥ ६॥  यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मेवाभूद्विजानतः ।  तत्र॒ को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ।॥७॥   ● शब्दार्थ - जो इस प्रकार   से सब  पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि भूतो को आत्मा मे ही देखता है ओर आत्माको इन सब भूतो मे देखता है वह॒ इस विचार के कारण पाप व घृणा नहीं करता ।  ॥६॥  जिस जानने वाले के ज्ञान मे यह सब भूत आत्मवत्‌ हो गये, इसलिये आत्मवत्‌ हो गये क्योकि कण-कण मे ईश ही बसा हुआ है । फिर वहां इन भूतों के अनेकत्व मे आत्मा के एकत्व unity in diversity देखने वाले के  लिए मोह कसा, ओर शोक कैसा ? ॥७॥  भावार्थ - जहां एकत्व - oneness है वहां दूसरे का छीनने, दूसरे का ले लेना निरर्थक हो जाता है और दूसरे की घृणा - hatred भी निरर्थक हो जाती है । जात, पंथ, धर्म आदि कारण से अलगाव जो है; वह धीरे-धीरे घृणा में परिवर्तित होते हैं । और एकत्व से वह घृणा कम हो जाती हैं । ■ आजकल परायापन और स्वार्थ इस कदर बढ़ रहा है कि हम एक दूसरे का छिन ले लेते हैं इतना के हम क...