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उपनिषद ज्ञान भाग ~ १५ Fear of death ?

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● उपनिषद ज्ञान भाग १५ इसोपनिषद श्लोक १५  हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌ ।  तत्त्वं पूषन् अपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये । १५॥  ○ हिरण्मय चमक-दमकवाले ढकने से सत्य का मुख ढका हुआ है ।  हे पूषन्‌ ! --अयनो पुष्टि अर्थात्‌ पोषण कर्ता सूर्यदेव; मैं सत्य- धर्म को देखना चाहता हूं इसलिए उस हीरण्मय पात्र का, या ढक्कन का आवरण  हटा दे, पर्दे को उठा दे ॥१५॥ ■ यहां पर हम चिन्मय स्वामी के हिसाब से अर्थ बताएंगे । स्वामी जी कहते हैं कि; इस 15 वे श्लोक में एक ऋषीवर / एक मुनिवर अपने आप मृत्यु के द्वार पर खड़ा पातें है और फिर कुछ चीजों का सोच विचार करते है और इसी कारण से सूर्य देव से कुछ मांगते भी है । वह कहते हैं;  हे सूर्य देव अब मेरी अंतिम घड़ी आ गई है । और मैं सत्य धर्म को देखना चाहता हूं । जब तू अपने इस प्रकाश को फैला कर रखेगा तो मुझे यह भौतिक सृष्टि ही दिखाई देगी । फिर मैं उस सच को  उस परम् ब्रह्म को देख नहीं पाऊंगा । तुम्हारी सुनहरे रंग की आभा मेरे लिए एक पर्दा हो जाएगा । प्रकाश होकर भी पर्दा हो जाएगा । इसलिए हे रवीदेव आप के यह जो सहस्त्र रश्मि / कीरण है उ...

गणेश प्रतिष्ठापना का गूढार्थ |

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श्री. गणपती प्रतिष्ठापना करताना जाणवते की आपल्या कडे परब्रम्ह परमात्मा यासंबंधी जे प्रचंड व्यापक विचार आहेत ते अत्यंत सोप्या पद्धतीने आपण एका पार्थिव मूर्तीत ओततो. म्हणजे च की त्या मातीच्या मूर्तीत आपण परब्रम्ह तत्व प्रस्थापित करतो / कल्पितो. त्यालाच प्रतिष्ठापना असे म्हणतात. तसेही ते तत्व जळी स्थळी काष्ठी पाषाणी असतेच. पण आपल्या लाडक्या मूर्तीत ते पहायला सोपे जाते. अर्थात हे समजून पूजा करायला हवी तर च होईल.     अथर्वशीर्षात पण लिहिले आहे की हे गणेशा तूच साक्षात आत्मा आहेस. ऋषी मुनींनी मूर्तिपूजेच्या माध्यमातून आपल्याला मूळ तत्व कळायला किती सोप्पे केले आहे नाही का ?  🕉 वैद्य प्रसाद फाटक ९८२२६९७२८८