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देव काहीही करत नाही.
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आज एक गोष्ट मोकळेपणाने बोलणार आहे. ● देव काहीही करत नाही ● तो फक्त सगळं व्यापून राहीलेला असतो. आणि देव / परब्रम्ह ही " कल्पना "आपल्याला खूप समृद्ध करून जाते. ● मग कोण काय करतं? देव करत नाही तर कोण करतं ? हा प्रश्न आहे. त्याचे उत्तर असे की आपण आपले काम चोख करत राहायचे. त्या उपर काही गोष्टी ना आपल्या हातात, ना देवाच्या, ना कोणाच्याच हातात असतात. ● त्याबाबत फक्त आपला दृष्टिकोन बदलायचा आणि पुढे जायचे. Chat GPT काहीवेळा त्यासाठी काही छान छान उपयोगी गोष्टी सांगतो बरं का!
उपनिषद ग्यान भाग ७ ~
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ॐ तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत : ।। इशोपनिषद ।। ५ ।। ■ शब्दार्थ - वह चलता है वह नही चलता। वह दूर है वह निकट भी है । वह इसके सबके अंतर मे है और इसके सबके बाहर भी है । ■ भावार्थ : ये जो परब्रह्म है वह हिलता भी नही है फिर भी वह सब को पीछे छोड देता है । हमने देखा है के वो परब्रम्ह सभी जगह पर मौजूद है तो हिलेगा कैसे ? हिलने के लिए उसकी जगह ही नहीं है । स्थिर है । भगवद्गीता मे भी आपको लिखा मिलेगा कि परमात्मा स्थिर है / स्थाई है । ■ और कहां है की यह सबको पीछे छोड़ देता है । क्योंकि कैसे हैं की यदि आप निकलते हो चाहे जिस वेग से निकले चाहे मन के वेग से निकले अब 1 मिनट के अंदर जहां पहुंचोगे; उसके पहले ही वह परब्रह्म पहुंच चुका है । क्यों कि वह है ही सब जगह । परमात्मा की सर्व व्यापकता और प्रभुता दिखाने के लिए यह श्लोक का चयन मुनियों ने किया था । अभी मन के बारे में देखते हैं - मन बहुत वेगवान है ; उसके जरी ये आप एक क्षण में हम यहां से अमेरिका पहुंच सकते हैं , चांद पर पहुंच ...
उपनिषद ज्ञान भाग ६ ~ Upanishad wisdom for better life.
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■ प्रियजन सबको मेरा प्रणाम. 🙏 उपनिषद ज्ञान भाग ६ ~ ॥ अनेजदेकं मनसो जवीयो नेनदेवा आप्नुवन्पुर्वमर्षवत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिष्वा दधति ।४॥ शब्दार्थ : यह परमात्मा कंपन तक नहीं करता फिर भी मन से अधिक वेगवान है, इंद्रिय उसे प्राप्त नहीं कर सकती । वह इंद्रियों से भी पहले वर्तमान है । यह स्थिर है, फिर भी दौड़ते हुए लोगों को व्यक्ति या प्राणी सब को पीछे छोड़ देता है । उसी के कारण वायु जो स्वयं हल्की है अपने से भारी जल को उठा लेती है । भावार्थ - ● कहते हैं कि परमात्मा स्थिर है l आकाश की तरह सभी जगह व्याप्त है तो हिलेगा कंहा ? यह है सब जगह । यह नहीं ऐसी जगह ही नहीं है । तो वह जाएगा कहां और आएगा कहां ? स्थिर है; लेकिन फिर भी मन से भी वेगवान इसलिए है कि वह सब जगह पहुंचा हुआ है । हमारा मन एक क्षण में किसी दूरस्थ सितारे पर जा पहुंचेग। लेकिन वह उसके भी आगे पहलेसे हि है । इसलिये एसा काव्यात्मक भाव से बोला है । ● और कहते हैं कि यह परमात्मा प्राप्त करने के लिए इंद्रिय पर्याप्त नहीं है । इंद्रिय मतलब नाक, कान आंख, त्वचा व जिव्हा । यह सब ज्ञान लेने वाली इंद्र...