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मानवता सर्वप्रथम विचार मंथन भाग ~2

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ईश्वर, धर्म, कर्म - ये सब  मनुष्य को बेहतर इंसान बनाने के उद्देश्य से हैं ।  मानवता के विरुद्ध सभी कामों का त्याग कर देना चाहिए। देव, धर्म, कर्म हे सर्व काही  माणसाने अधिक चांगला माणूस बनणे  यासाठी आहे.  माणुसकी विरुद्ध असणारी  सारी कामं छाटून टाकायची.

मानवता और धर्म. नास्तिकों की मानवता.

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■ मैं हाल ही में फ्रैंकफर्ट-शिकागो फ्लाइट से यात्रा कर रहा था। उस समय मेरी मुलाकात एक पोलिश व्यक्ति से हुई। जब हमने उससे बातचीत की, तो उसने कहा; 'मैं नास्तिक हूँ। ईसाई धर्म में तरह-तरह की अनैतिकता देखकर मैंने खुद को बाहर कर लिया।'  ● फिर हमारी मानवता के बारे में कुछ बातें हुईं। उस समय उसने एक बहुत बढ़िया कथन कहा कि; "यदि आप एक अच्छे इंसान बनना चाहते हैं, तो आपको धर्म या ईश्वर की आवश्यकता नहीं है।" कितना बढ़िया वाक्य है! मैंने पहले भी यह कहा है। लेकिन चूँकि मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ, इसलिए उस नास्तिक पोलिश व्यक्ति का यह कथन मेरे द्वारा कही गई बात से अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए मैंने इसे यहाँ उद्धृत किया है।  ■ फिर सवाल उठता है - हमें इस तथ्य से क्या समझना चाहिए कि मानवता के बारे में लिखते समय अक्सर धर्मों का उल्लेख किया जाता है? यदि धर्म के बिना मानवता बढ़ सकती है। तो फिर धर्म का उल्लेख करने की लगातार आवश्यकता क्यों है?  □ इसके पीछे दो कारण हैं, एक अच्छा और एक बुरा।  ● 1 अच्छा कारण यह है कि मूल रूप से जैसा कि हमने पहले लिखा; धर्म की रचना इसलिए की गई ताकि मानवता विकसित ...

उपनिषद ज्ञान भाग 3 Upanishads wisdom

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उपनिषद ज्ञान भाग 3 :   ■ प्रिय जन को मेरा हार्दीक नमस्कार | 🙏 🔵 आज थोडीसी पूर्व पीठीका बताता हूं । पहले मैं अध्यात्म पर भाषण करता था । तब मैं सोचने लगा की :- 1️⃣ मैं आध्यात्म की सारी की सारी बातें जैसे के तैसे स्वीकारता हूं या नहीं ? 2️⃣ और यह  भी सोचने लगा कि जो मुझे accepted है स्वीकृत है वह मैं पूरे के पूरे तरह से जीवन में लाता हूं कि नहीं ? ■ इसका जवाब नकारात्मक होने के कारण मैंने अपना अध्यात्म पर भाषण देना बंद कर दिया ।  🟢 फिर आज 15 साल के बाद क्यों उपनिषद बता रहा हूं ? यह सही सवाल है ।   इसका जवाब है कि :- 1️⃣ मैं खुद साधु, संत या आध्यात्मिक गुरु के हैसियत से नहीं बोल रहा हूं । 2️⃣ मैं स्वीकृत करता हूँ कि यह यह चीज मुझे स्वीकृत नहीं है । l agree to defer with certain preaches. अब यहां पर जो स्वीकृत है उसे बोलूंगा नहीं है उसे नहीं कहूंगा  | हिंदू धर्म ही क्या मेरा तो सभी धर्म से आज यह आवाहन है के नए सिरे से हर एक वक्तव्य का परिशीलन करें और उसमें जो अच्छी बातें हैं वह रखें और जो धर्म विचार सही नहीं है वह स्वीकार न करें । 3️⃣ कोशिश कर रहा हूँ...