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मानवता के विचार संग्रह हिन्दी ...मानवता thoughts compilation in Hindi

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1 विश्व की सारी समस्या अति स्वार्थ बुद्धि से दूसरों को तकलीफ देना और उनका शोषण करना । इस कारण सारी समस्या पैदा हुई है । उसका एकमात्र जवाब मानवता है - जो सिखाता है कि दूसरों को तकलीफ नहीं देना है । दूसरों का शोषण नहीं करना है । दूसरों के ऊपर अनैतिक दबाव नहीं बनाना है । इसलिए मानवता सभी धर्मों से ऊपर है। उलटा मानवता ही वह कारण है जिसके कारण धर्मों का निर्माण हुआ।  देखें कैसे:  ■ शुरुआती दौर में हम जानवरों की तरह ही रह रहे थे। फिर हम अपने मस्तिष्क, भावनाओं और विचारों के कारण बड़े होने लगे। हम चाहते थे कि हम बेहतर इंसान बनें। कोई भी दूसरा जानवर बेहतर कुत्ता या बेहतर चिडिया बनने के बारे में नहीं सोचता! इसके विपरीत मनुष्य स्वार्थी उद्देश्यों के कारण कभी-कभी हम जानवरों से भी बदतर हो जाते हैं।  ■ दोनों कारणों से मानवता के विचार / आचार की आवश्यकता हुई । अलग-अलग संस्कृतियों और अलग-अलग धर्मों ने लोगों को बेहतर इंसान बनाने का काम अपने हाथ में लिया। तो इसमें सबसे पहले क्या आया है यह स्पष्ट है! कुछ धर्म इस काम में बेहतर हो सकते हैं और कुछ नहीं।  ■ इसलिए इस बात की पूरी संभावना है...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ १३ upanishad wisdom for us.

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उपनिषद ज्ञान भाग ~ १३. इशोपनिषद श्लोक १२ और १३ - अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते ।  ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्याः रताः ।१२॥  अन्यदेवाहुः संभवादन्यदाहुरसंभवात्‌ ।  इति शुश्रुम धीराणां  ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३।  जो असंभूति' (अ+-सं + भूति), अर्थात्‌ व्यक्तिवाद individualism की उपासना करते हैं वे गहन अन्धकार मे प्रवेश करते है ।  और जो संभूति" (सं + भूति) अर्थात्‌ समष्टिवाद pluralism   उससे भी गहन अन्धकार में प्रवेश करते हें ।१२॥  संभव" ( सं + भव ) अर्थात्‌ " ' समष्टिवाद' का कुछ और फल है ।  असंभव' ( अ + सं + भव ) अर्थात्‌ समिष्टरूप में न रहकर व्यक्ति को समाज मे मुख्य मानकर ' व्यक्तिवाद'  से चलने का कुछ ओर फल है ।  धीर लोगों ने इन दोनों की जो व्याख्या की है उससे ऐसा ही सुनते आये हैं ॥१३॥  इन २ श्लोक का यह था आचार्य सत्यव्रत जी ने किया हुआ सीधा भाषांतर ।  आज के विश्व में जो दो बड़े पॅटर्न चलते आए हैं - गत 100 साल में; वह आध्यात्मिक नहीं - आर्थिक विषय में और सामाजिक विषय में व्यवस्थापन करने वाले दो वाद हैं । बहुत प्...

उपनिषद ज्ञान भाग ~ ११ Upanishada wisdom for our use.

卐 उपनिषद ज्ञान भाग ~ ११   अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।  ततो भूय इव ते तसो य उ विद्यायां रताः ॥९॥  शब्दार्थ : जो " अविद्या "अर्थात्‌ भौतिकवाद " ( materialism ) की उपासना करते है वे गहन अन्धकार मे जा पहुंचते हैं, ओर जो “विद्या " अर्थात्‌  अध्यात्मवाद  " ( spiritualism ) मे रत रहने लगते है; और भौतिक-जगत्‌ की परवाह ही नहीं करते वे उससे भी गहरे अन्धकार मे पहुचते हैं   ॥९॥  balance the both! कई लोगों को यह लगता है कि हमारी जो सांस्कृतिक धरोहर है वह केवल भौतिक जीवन का त्याग सिखाने वाली ही है । वैसा था तो नहीं   लेकिन लोगों को वैसा होने का एहसास होता रहा इसका कारण है की बीच वाले समय में भक्ति मार्ग आदि का आग्रह करते हुए कामना वासना और भौतिक जीवन की बाकी सभी इच्छाओ को  बहुत कम आंका गया ।  यह बात लोगों के जीवन में आइ ऐसे तो नहीं; लेकिन सर्व सामान्य लोगों की या सामाजिक भावना ऐसे रही कि केवल भक्ति में रत रहो । केवल सदा सर्वदा देव देव करो । यह हो गया था ।   उसके पहले का एक समय था जब कामशास्त्र के अनुयाई और अध्यात्म ज्ञान ...