Posts

Showing posts with the label happiness

जे कृष्णामूर्ती यांचा व्यावहारिक सल्ला j krusnamurti preaches

Image
जिद्दू यांनी खूप व्यावहारिक आणि छान मार्ग सांगितला. उपनिषदां मध्ये देखील असाच छान आणि व्यावहारिक मार्ग दिला आहे.  आपल्याला वाटतं हिंदुत्वज्ञान अध्यात्मिकता हे सगळे एकांगी आहे; पण तसे नाहीये. म्हणून हे वाचा. आधुनिक संत जे. कृष्णमूर्तीजी हे अधिक व्यावहारिक ऋषी होते. ते म्हणतात की अन्न, पैसा आणि सेक्सची गरज या नैसर्गिक इच्छा समस्या नाहीत. त्या जीवनाचा भाग आहेत; परंतु या गोष्टींची अतिरेक किंवा लोभ किंवा वासना ही समस्या आहे. ती तुमच्यासाठी आणि समाजासाठी दुःख निर्माण करते. या अतिरेकी लोभामुळे आजचा समाज अशांत आहे. म्हणून आपण योगाचा मार्ग अवलंबूया आणि सर्वांना आनंद देण्याच्या अंतिम ध्येयासाठी स्वतःला आणि आपल्या समाजाला शुद्ध करूया. जय गुरुदेव. A modern saint J krushnamurti ji was more practical sage. He says natural urges viz. need of food, money and sex are not a problem. They are part of life; but too much want or greed or lust of these things is the problem. It creates unhappiness to you and also the society. Today's society is on unrest due to these excessive greed. So let us follow th...

कैसे मिलेगा अंतिम सुख यह बता रहे है उपनिषद

Image
https://youtu.be/nbEtMYzRG_E?si=PLO3AwnUh06nBmw9     उपनिषद में 🕉️कार का महत्व बहुत है; इसलिये इस व्हिडिओ के अंतिम भाग में मैं आपके साथ कुछ ओंकार साधना कर रहा हुं ।  *धन संपत्ती कामवासना से बढकर ' ज्ञान ' है - जो अंतिम, ड्युरेबल व सर्वोच्च सुख देगा ।*  धनसंपत्ती इ. से भी सुख मिलता है; लेकिन वो जादा ड्युरेबल नही होता । इसीलिए दोनो का भी अनुसंधान करना चाहिए । कृपया Like, share, comment & subscribe करना ना भूलें । 🙏

उपनिषद ज्ञान भाग ~ ८ ॐ Upanishad wisdom ।

Image
उपनिषद भाग ८ ~ सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।  सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते । ॥ ६॥  यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मेवाभूद्विजानतः ।  तत्र॒ को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ।॥७॥   ● शब्दार्थ - जो इस प्रकार   से सब  पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि भूतो को आत्मा मे ही देखता है ओर आत्माको इन सब भूतो मे देखता है वह॒ इस विचार के कारण पाप व घृणा नहीं करता ।  ॥६॥  जिस जानने वाले के ज्ञान मे यह सब भूत आत्मवत्‌ हो गये, इसलिये आत्मवत्‌ हो गये क्योकि कण-कण मे ईश ही बसा हुआ है । फिर वहां इन भूतों के अनेकत्व मे आत्मा के एकत्व unity in diversity देखने वाले के  लिए मोह कसा, ओर शोक कैसा ? ॥७॥  भावार्थ - जहां एकत्व - oneness है वहां दूसरे का छीनने, दूसरे का ले लेना निरर्थक हो जाता है और दूसरे की घृणा - hatred भी निरर्थक हो जाती है । जात, पंथ, धर्म आदि कारण से अलगाव जो है; वह धीरे-धीरे घृणा में परिवर्तित होते हैं । और एकत्व से वह घृणा कम हो जाती हैं । ■ आजकल परायापन और स्वार्थ इस कदर बढ़ रहा है कि हम एक दूसरे का छिन ले लेते हैं इतना के हम क...

उपनिषद ज्ञान भाग ५ Upanishad wisdom.

Image
उपनिषद ग्यान ५ :  ■ प्रियजन को मेरा हार्दीक नमस्कार | 🙏  निष्काम कर्म करने के लिए दो युक्तियां बताई गई है । इसमें एक है कि दूसरे श्लोक में जो बोला था - " जो भी है वह उसीका तो है, मेरा है ही नहीं । " यह बात सोच कर निष्काम हो जाएंगे । जब करने वाला, कराने वाला और फल देने या न देने वाला वही तो है; तो मैं काहे को चिंता करूं ? मेरा कुछ है ही नहीं.. इसलिए फल से भी मैं बंधा नहीं हूं । यह एक तरीका है ।  दूसरा तरीका है कि जो भी मैंने किया है हर एक चीज उसको समर्पित कर देना । यदि मैं खाता हूं तो पहले उसे नैवेद्य दिखाना - समर्पण करना । और यदि मैं सक्सेसफुल हो जाता हूं यशस्वी हो जाता हूं तो वह भी उसी के कारण है तो उसी को अर्पित है । हर एक चीज उसको अर्पण करना ।  यह कर्म फलों को त्याग करने की युक्तियां हैं । वैसे ही कर्म फल को त्यागना आसान बात नहीं होगी । □ असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः \  ता स्ते प्रत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः \\३ जो अपनी आत्मा का हनन करते हैं वे लोग मरने के बाद अंधकार से आवृत " असूर्य "लोक स्थान पर में पहुंच जाते हैं । जो लोग गलत काम करते ...

उपनिषद ज्ञान भाग ४ । upanishad wisdom for happiness.

📃 उपनिषद ज्ञान भाग ४ : ईशावास्य उपनिषद -  कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत. समाः ।  एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कमं लिप्यते नरे ॥२॥) ।  सरल अर्थ है - हर मनुष्य को कर्म करते हुए 100 साल जीने की आकांक्षा करनी चाहिए । इसके अलावा दूसरा कोई मार्ग नहीं है । और ऐसा करेंगे तो कर्म का लेप नहीं होगा ।  卐 पहली पंक्ति में बहुत बातें आती हैं ।  ● एक - काम करो कर्म करते रहो । ● दूसरी -100 साल तक / दीर्घकाल जियो और कर्म करते रहो ।  ● तीसरी यदि आपको दीर्घकाल कर्म करते हुए जीना है तो स्वस्थ जीवन की जरूरत है ।  ■ पहले पंक्ति को सम अप करेंगे : स्वस्थ रहो, दीर्घकाल जियो और कर्म करते हुए जियो । 卐 दूसरे पंक्ति मे यह प्यार से बोला है; कि यह आपको मैंडेटरी है / कंपलसरी है । लेकिन यह कंपल्शन प्यार से होता है यदि आप आराम करते बैठो तो कोई आकर आपको मारने वाला तो है नहीं । ● युवाओं के लिए जबरदस्त प्रेरणा दी है । जीवन का उद्देश्य ही दे दिया । work is worship. काम से जब हम बोअर हो जाते हैं, थक जाते हैं तो मनोरंजन की तो जरूरत है । वह करना भी चाहिए लेकिन वोही करते रहेंगे या उसकी मात...